20 वीं शताब्दी की उत्तरप्रदेशीय विद्वत् परम्परा
 
मिथिलेश कुमारी मिश्रा
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जन्म 01 दिसंबर 1953
जन्म स्थान कटियारी (पंचनद)हरदोई
निधन 10 अप्रैल 2017
स्थायी पता
कटियारी (पंचनद)हरदोई

मिथिलेश कुमारी मिश्रा

संस्कृत, हिन्दी और तमिल भाषा में अपनी सक्रिय सेवा से महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाली स्वर्गीया डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्रा का जन्म हरदोई जनपद के कटियारी (पंचनद) कहे जाने वाले अति पिछड़े देहात क्षेत्र के ग्राम खद्दीपुर गढ़िया (बरान) में दिनांक 1 दिसम्बर 1953 ई. को हुआ था। आप के पिता का नाम श्री रामगोपाल मिश्र तथा माता का नाम भगवती देवी था। आप के पिता पं. राम गोपाल मिश्र एक आस्तिक शिवभक्त सरल सौम्य स्वभाव वाले रहे। इसी तरह से माता जी भी बड़ी आस्थावान महिला थीं जो पूजा-पाठ में विशेष श्रद्धा रखती थीं। दैवयोग से देवी स्वरूप इस कन्या का जब घर में उद्भव हुआ, घर में मंगल जैसा वातावरण रहा। धीरे-धीरे जब यह चार साल की हुई तो जागरूक माता पिता ने गाँव के ही प्राथमिक पाठशाला में पढ़ने के लिए भेज दिया। बचपन से ही यह बहुत ही प्रतिभावान् थीं और पढ़ने में बहुत अधिक रूचि रखती रहीं। धीरे-धीरे इन्होंने पड़ोस के जूनियर विद्यालय से आठवीं की कक्षा उत्तीर्ण किया। आगे की पढ़ाई के लिए कटरी क्षेत्र में कोई विद्यालय निकट न होने के कारण माता पिता ने अपनी इस लाडली बिटिया को शिक्षा प्राप्त करने के लिए पड़ोस के जनपद फर्रूखाबाद भेज दिया, साथ ही वहीं माता पिता भी रहने लगे। यहीं पर रहकर श्री बद्रीविशाल कालेज से स्नातक और परास्नातक की डिग्री प्राप्त किया।

छात्र जीवन से ही यह कुशाग्र बुद्धि वाली थीं। विद्यालयीय सांस्कृतिक क्रिया कलापों में प्रतिभाग करना, श्लोक पाठ,कविता, भाषण आदि में प्रमुखता से रुचि रखती थीं। सहज प्रतिभा की धनी मिथिलेश जी आरंभ से अपने स्फुट वक्तृत्व शक्ति, उच्चारण की निर्दोषता और अपने आत्मविश्वास से पूर्ण भावाभिव्यक्ति द्वारा गुरुजनों का सदैव स्नेह भाजन बनी रहती थीं तथा उनके हृदय को जीत लेती थीं।

यही कारण था कि प्रत्येक महाविद्यालयीय प्रतियोगिताओं में यह सदैव प्रथम स्थान पर हुआ करती थीं। प्रख्यात कवि डॉ. शिव ओम अम्बर जो कि इनके सहपाठी रह चुके हैं उन्होंने अपने एक लेख में महाविद्यालय स्मृति को ताजा करते हुए लिखा है-‘यह सन् 1968-69 की बात है उन दिनों मैं फर्रुखाबाद के बद्रीविशाल महाविद्यालय की स्नातक कक्षा का छात्र था। उन दिनों महाविद्यालय परिवेश में राजनीति का कर्दम उतना ऊँचा नहीं था। हर विषय से जुड़ी एक परिषद् थी जिसमें समय-समय पर विचार गोष्ठियाँ होती रहती थी। शोध पत्र पढ़े जाते थे विद्वानों को किसी विषय पर बोलने के लिए बुलाया जाता था। ऐसे माहौल में अतिशय प्रतिभाशाली छात्र-छात्रायें अनायास ही सबकी नजर में आ जाते थे, और सहपाठी मित्रों में छोटे-मोटे नायक का दर्जा प्राप्त कर लेते थे। मिथिलेश जी व मैं स्वयं ऐसे ही सौभाग्यशाली छात्र छात्राओं में थे जिन्हें तत्कालीन अनुशासनप्रिय प्राचार्य महिमाचरण सक्सेना जी नाम लेकर पुकारते थे। महाविद्यालय के एक अन्तर्विश्वविद्यालयीय प्रतियोगिता के आयोजन में मिथिलेश जी कैसे सबके हृदय में छा गयीं उसका उल्लेख करते हुए डॉ. शिव ओम अम्बर जी ने लिखा है-इसी उत्सव में एक ऐसा भी क्षण आया जब पुनः पुनः पुरस्कार के लिए एक ही छात्रा का नाम आहूत होने पर भावविह्वल हुए डॉ. राम कुमार वर्मा (प्रख्यात नाटककार) उस छात्रा को पुरस्कार देने के बाद उसके शीर्ष पर अपना शुभाशीषी हाथ रखकर खड़े रहे और सारा सभागार देर तक उल्लासित करतल ध्वनियों से अनुगुंजित होता रहा। हम सब मिथिलेश के सौभाग्य की स्पृहा कर रहे थे...... यह छात्रा समय की कसौटी पर अपने बैदुष्य की स्वर्ण रेखाओं से यश के कीर्तिमानों की जन्मपत्रियाँ लिखेंगी। यही छात्रा आगे चलकर एक कीर्तिमान गढ़ी जिन्होंने बिहार राष्ट्र भाषा परिषद पटना के निदेशक (डाइरेक्टर) पद को समलंकृत किया।

साहित्यिक उपलब्धियाँ-आप कितनी विद्या व्यसनी थीं इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि आपने हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी विषयों में एम.ए. किया। दो विषयों में आचार्य तथा मगध विश्वविद्यालय से एलएलबी तथा पत्रकारिता में डिप्लोमा भी किया है। लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. पी-एच.डी. तथा कानपुर विश्वविद्यालय से डी.लिट् की उपाधि प्राप्त की।

मिथिलेश जी का विवाह सरल व्यक्तित्व के धनी पं. मूल चन्द्र मिश्र से हुआ था।

वर्तमान में आपका इकलौता पुत्र नीलाभ कुमार मिश्र अपने माता पिता के आदर्शों पर चलकर अपने गृहस्थाश्रम जीवन में रत है।

श्रीमती मिश्रा ने न केवल संस्कृत एवं हिन्दी में अपितु तमिल भाषा की एक जीवन्त लेखिका के रूप में अपना नाम दक्षिण भारत में रोशन किया है। इन्होंने दक्षिण भारत के तमिल कवि एम. गोविन्द राजन् द्वारा रचित तमिल रामायण का हिन्दी में अनुवाद किया है। तत्पश्चात् एम गोविन्द राजन् ने मिथिलेश जी द्वारा हिन्दी में रचित ‘अंजना’ का अनुवाद तमिल भाषा में किया जिसके लिए उन्हें दो पुरस्कार प्राप्त हुए। इन्हें प्रतिष्ठित ‘तमिलप्रेमी’ पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। दक्षिण भारत के कई छात्र छात्राओं ने इनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर शोध किया है तो कई शोध छात्रों ने इनके निर्देशन में पी-एच.डी. की उपाधि भी प्राप्त किया हैं। डॉ. आर. कल्पना चेन्नै की इन्होंने ‘श्री कल्कि कृष्ण मूर्ति और यशपाल के उपन्यासों का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर कानपुर विश्वविद्यालय से 2008 ई. में पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त करवायी। इनके द्वारा रचित कई हिन्दी व संस्कृत नटकों को उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आन्ध्रप्रदेश, बिहार और तमिलनाडु के स्कूल कालेजों के पाठ्यक्रमों में स्थान दिया गया है। यदि देखा जाय तो साहित्य इनकी साँसों में रचा बसा है। हिन्दी अधिकारी, दूर दर्शन केन्द्र चेन्नें की डॉ. सुब्बा लक्ष्मी गणेशन के शब्दों में ‘आज भी मिथिलेश जी अपनी रचनाओं के जरिये हमारे बीच जीवित हैं। अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज और राष्ट्र को दिये गये उत्तम मार्ग दर्शन, आदर्श चिन्तन, समाजोत्थान सम्बन्धी कल्याणकारी विचार देश काल की सीमाओं को लाँघकर हमेशा के लिए चिरकाल तक अमर रहेगी। (मूल चन्द्र उपायन 2018 पृ. 29) डॉ. एस. बालू (एम.एस. आर्थो चेन्नै तमिलनाडु) के शब्दों में ‘उनकी सादगी और विनम्रता से मुझे उनकी रचनाएँ, पुरस्कार, उपाधियों, पदवी आदि के बारे में जानकारी मिली तो बड़ा ही विस्मय हुआ कि एक व्यक्तित्व में इतनी उपलब्धियाँ...।

हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, तमिल में लिखी गयी आपकी 42 पुस्तकें हैं। यहाँ हम केवल संस्कृत में रची गयी रचनाओं का उल्लेख कर रहे हैं-

(1) चन्द्रचरितम् महाकाव्य

(2) सुभाषित सुमनोन्जलि

(3) व्यासशतकम्

(4) काव्यायनी (काव्य संग्रह)

(5) आम्रपाली

(6) दशमस्त्वमसि

(7) तुलसीदासः (नाटक)

(8) जिगीषा (उपन्यास)

(9) लघु कथा एवं

(10) आधुनिका (कहानी संग्रह) हैं।

पुरस्कार और सम्मान-डॉ. मिथिलेश जी ने थाई रामायण का हिन्दी पद्यानुवाद किया था। इसके लिए 20 में थाईलैंण्ड की राजकुमारी ने के साहित्य समारोह में आप को सम्मानित किया था। दुबई तथा नेपाल में भी आपको पुरस्कृत एवं सम्मानित किया गया।

पत्र तथा पत्रिकाओं में योगदान- कानपुर से प्रकाशित ‘नवप्रभातम्’ की संपादकीय मण्डल में सक्रिय सदस्य रहीं। बिहार प्रदेश पटना की 135 वर्ष पुरातत्त्व ‘संस्कृत संजीवन समाज’ त्रैमासिक पत्रिका की संपादिका के गुरुतर दायित्व का निर्वहन किया।

सामाजिक कार्य-आपने सामाजिक रचनात्मक कार्यों में सक्रिय रूप से कार्य किया। 1996 ई. में अपने पैतृक गाँव खद्दीपुर में ‘लोकहित पुस्तकालय वाचनालय’ की स्थापना किया। अपने माता पिता की स्मृति में ट्रस्ट का संचालन फर्रुखाबाद में किया तथा एक लाइब्रेरी की संस्थापना भी की। साथ ही अपने पतिदेव स्व. मूल चन्द्र मिश्र के नाम से इटौंजा में एक संस्थान की स्थापना की जहाँ पर प्रति वर्ष 20 नवम्बर को साहित्यिक समारोह का आयोजन एवं साहित्यसेवियों को सम्मानित किया जाता है।

शैक्षिक उद्देश्य से विदेश भ्रमण-शैक्षिक उद्देश्य से डॉ. मिथिलेश जी ने नैपाल तथा सऊदी अरब देशों का भ्रमण किया।

10 अप्रैल 2017 को आपका पार्थिव शरीर पंचतत्त्व में विलीन हो गया।