20 वीं शताब्दी की उत्तरप्रदेशीय विद्वत् परम्परा
 
डॉ0 श्रीराम आर्य
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जन्म स्थान कासगंज-नगर
स्थायी पता
कासगंज-नगर

डॉ0 श्रीराम आर्य

डॉ0 श्रीराम आर्य का जन्म बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उत्तर प्रदेश के कासगंज जनपद के कासगंज-नगर में एक अत्यंत समृद्ध वैश्य परिवार में हुआ था तथा सन् 1988 ईस्वी के जुलाई मास में इनकी एहलौकिक यात्रा पूर्ण हुई थी। आचार्य डॉ. श्रीराम आर्य अनपत्य ही थे। इन्होंने अपनी आयु के अन्तिम दशक में एक कन्या को दत्तक पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया था। सम्प्रति डॉ0 दम्पती के निधन के बाद वह कहाँ और कैसी है? कुछ पता नहीं है।

आचार्य डॉ0 श्रीराम आर्य एक विलक्षण-मेधा के धनी व्यक्ति थे। उनका व्यक्तित्व अत्यन्त आकर्षक और प्रभावशाली था। जहाँ वे एक सफल चिकित्सक थें वहीं वे सहन शास्त्रमर्मज्ञ, सुधी-चिन्तक, गम्भीर-गवेषक तथा सुयोग्य लेखक भी थे। उनकी लेखनी में जादू था। जब वे लिखते थे तब ऐसा लगता था माना उनकी कलम लिख नहीं रही है अपितु कागज पर दौड़ रही है। उन्होंने अपनी खण्डन-मण्डन ग्रन्थमाला के अन्तर्गत लगभग 150 (एक सौ पचास) ग्रन्थ लिखकर स्वयं प्रकाशित किया था।

इनके जीवन-परिचय की भांति इनका लिखित साहित्य भी इस समय पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है। कुछ ग्रन्थों उपलब्ध हुए के नाम अधोलिखित हैं-

1. श्रीमद्भागवतसमीक्षा-इस ग्रन्थ में आचार्य जी ने बड़े ही परिश्रम से भागवत पुराण की तटस्थ सचेता बनकर गम्भीर समालोचना प्रस्तुत की है। उनका मानना है कि ‘श्रीमद्भागवत-पुराण’ में वर्णित वासुदेव श्री कृष्ण का जीवनचरित वास्तविक न होकर केवल जयदेव आदि संस्कृत कवियों की मनोरम और क्वचित् अश्लील तथा बीमत्स कल्पना है, जो उन्हें शिखामणि तो सिद्ध करती है, परन्तु योगेश्वर नहीं तदनुसार श्री कृष्ण का वास्तविक जीवन-चरित तो कृष्ण द्वैपायन व्यास कृत ‘महामारतम्’ में वर्पित है। वे वस्तुतः सुदर्शनचक्रधारी हैं, मुरली मनोहर नहीं, ‘राधामाधव’ न होकर ‘रूक्मिणीकान्त’ हैं, प्रद्युम्नपिता है; अद्भुत नीतिवेत्त और प्रयोक्त, विराट् बलवान् और महान् तत्त्ववेत्ता हैं, गोपवघूटी दुकूलचौर नहीं।

 

2. श्रीमद्गवद्गीता विवेचन-आचार्य डॉ0 श्रीराम आर्य का यह ग्रन्थ भी उनके गम्भीर चिन्तन और अध्यवसाय का परिणाम है। जिस प्रकार सम्पूर्ण गीता में अट्ठारह अध्याय है, उसी प्रकार इस ग्रन्थ में आचार्य ने गीता के प्रत्येक अध्याय की विषय वस्तु का उपपादान करके अट्ठारह प्रवचनों के रूप में अपने गम्भीर विचार प्रकट किए हैं, जो शोधच्छात्रों एवं तत्त्वज्ञानियों के लिए अत्यन्त उपयोगी है।

3. अद्वैतवाद-मीमांसा-आचार्य श्रीराम आर्य का यह ग्रन्थ यद्यपि कलेवर की दृष्टि से लघुकाय है। तथापि विषयवस्तु और ‘विषय-प्रतिपादन’ की दृष्टि से अन्यत महत्वपूर्ण है। इसमें डॉ. श्रीराम आर्य ने यथामति अनेक वेद, दर्शन, व्याकरण और ‘पुराण-ग्रन्थों’ के प्रामाण्य और नानाविध युक्तियों से शाङ्कर वेदान्त का निरसन करते हुए श्रीमद्दयानन्दीय त्रिक्दर्शन को समुचित ठहराया है।

4. वेद ही ईश्वरीय ज्ञान हैं-यह डॉ. श्रीराम की अकाट्य-प्रमाणों और दुर्लभ-युक्तियों से सम्बलित अत्यन्त महत्वपूर्ण रचना है। इसमें प्रसङ्गोपात्त सभी पूर्वपक्षों का युक्ति-प्रमाणपुरस्सर परिहार करके चार मूल ‘वेद-संहिताओं’ को ‘अपौरुषेय’ अर्थात् ‘ईश्वरीय-ज्ञान’ सिद्ध किया है। यह रचना अवश्य ही पठनीय है।

5. ईश्वरसिद्धि-आचार्य ‘उदयन’ की ‘न्यायकुसुमाञजलि’ की भावभूमि पर लिखित आचार्य डॉ. श्रीराम आर्य का यह ग्रन्थ भी बेजोड़ है। इसमें चार्वाक् आदि नास्तिकों की सभी मान्यताओं और अनुपपत्तियों का बड़ी ही बारीकी से परीक्षण करते हुए उनका निराकरण करके ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध किया गया है। इसी प्रकार उनके ‘टोंक का शास्त्रार्थ’, ‘मौलवी हार गया’, ‘र्कुआनदर्पण’, ‘बाइबिलदर्शन’ तथा अर्थ सहित ‘आदर्श-विवाहपद्धति’ प्रभृति अनेक ग्रन्थ ऐसे हैं, जो यत्र-तत्र उपलब्ध हो जाते हैं, शेष ग्रन्थ तो अब अनुपलब्ध प्राय हो चुके हैं।