20 वीं शताब्दी की उत्तरप्रदेशीय विद्वत् परम्परा
 
ब्रह्मानन्द शुक्ल
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जन्म स्थान ग्राम चरथावल
स्थायी पता
ग्राम चरथावल मुज़फ्फरनगर

ब्रह्मानन्द शुक्ल

ब्रह्मानन्द शुक्ल (उत्तर प्रदेश, १६०४-१६७०) मुज़फ्फरनगर जिले के चरथावल ग्राम में जनमे कवि शुक्ल खुरजा के श्रीराधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय, खुर्जा में साहित्य विभाग के अध्यक्ष के रूप में सेवा की। इनमें संस्कृत के पाण्डित्य के अतिरिक्त कवित्व का भी विशेष गुण था। इन्होंने अनेक कृतियां संस्कृत साहित्य को दीं, जिनमें लघुकाव्य श्रीगान्धिचरितम् भी है। इनकी अन्तिम रचना श्रीनेहरूचरित महाकाव्य है जो अट्ठारह सर्गों में निर्मित है, जिसका प्रकाशन शारदासदनम् ३८ राधाकृष्ण, खुरजा (उ. प्र.) से १६६६ में हुआ स्वयं कवि शुक्ल ने लिखा है कि यहां लक्षण ग्रन्थों में प्रतिपादित महाकाव्य के लक्षणों का उन्होंने परिपालन नहीं किया है, प्रत्युत युगानुसार महाकाव्य के लक्षण को ध्यान में रखकर रचना की है। श्रीनेहरूचरित में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के जीवन चरित को आधार बनाया गया है। कवि ने पं. नेहरू के जन्म से लेकर उनके दाम्पत्य सौख्य के वर्णनों में महाकाव्य का तीन चौथाई भाग लगाया है। नेहरूजी का जन्म किसी योगीश्वर के पुर्नजन्म ग्रहण के रूप में होता है (चतुर्थ सर्ग)। विदेशों में अध्ययन, पिता पं. मोतीलाल के निर्देश पर गांधी जी के साथ होना और कांग्रेस के एक सदस्य के रूप में देश की सेवा में जुट जाना, कमला के साथ विवाह, पिता, पत्नी और माता के स्वर्गवास, पुत्री इन्दिरा के लिए उच्च शिक्षण का निश्चय वर्णित होते हैं और चतुर्दश सर्ग के अन्त में, पं. नेहरू प्रधान मन्त्री होते हैं। बाद के सर्गों में नेहरूजी के विविध कार्यकलापों का वर्णन है। काव्य का अन्त उनके स्वर्गवास की घटना को लेकर होता है। यहां कवि ने इतिवृत्तात्मकता को प्रश्रय दिया है, फिर भी कवि का कवित्व पक्ष बहुत शिथिल नहीं हुआ है। वर्णनों के लिए उसे पर्याप्त अवसर मिलता है, किन्तु उनमें वह उलझता नहीं। वर्णनों में वस्तुस्थिति को यथार्थ रूप से प्रस्तुत करने में उसका अधिक मनोयोग लक्षित होता है। पं. नेहरू के रूप में काव्य का नायक न केवल देश के पारतन्त्र्य की समस्या, बल्कि एक ही साथ अनेक पारिवारिक कठिनाइयों से भी जूझता हुआ निर्दिष्ट हुआ है पितरौ स्थविरौ जाती पुत्री पञ्चदशाब्दिका। पत्नी रोगाकुला हन्त कीदृशीयं विडम्बना ! १३/५२ (माता-पिता बूढ़े हो चले, पुत्री पांच साल की है, पत्नी रोग से पीड़ित है, हाय कैसी विडम्बना है ! )